मुंबई । फिल्मों में अगर विलेन न हो तो उनका स्वाद अधूरा लगता है, क्योंकि जब तक कहानी में खलनायक नहीं होगा, तब तक हीरो का जलवा भी फीका पड...
मुंबई
। फिल्मों में अगर विलेन न हो तो उनका स्वाद अधूरा लगता है, क्योंकि जब तक
कहानी में खलनायक नहीं होगा, तब तक हीरो का जलवा भी फीका पड़ जाएगा। आज के
दौर में भले ही फिल्मों में हीरो का बोलबाला है, लेकिन 70 से 90 के दशक
में विलेन ही पर्दे पर राज करते थे। अमरीश पुरी, डैनी डेन्जोंगपा, मुकेश
तिवारी, रंजीत और प्राण जैसे कलाकारों ने अपने खलनायक किरदारों से ऐसी छाप
छोड़ी कि लोग उन्हें असल जिंदगी में भी विलेन समझ बैठते थे। लेकिन इन सभी
पर भारी पड़ा था फिल्म शोले का ‘गब्बर सिंह’। इस किरदार के नाम से सिर्फ
गांव के बच्चे ही नहीं, बल्कि फिल्मी हीरो तक कांप उठते थे। इस किरदार को
हिंदी सिनेमा के इतिहास में अमर बनाने वाले थे अमजद खान, जिन्हें बॉलीवुड
का सबसे डरावना विलेन कहा गया। आज उनकी जयंती के मौके पर जानते हैं कि कैसे
एक किताब ने उन्हें गब्बर बनने की प्रेरणा दी।



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