रायपुर। प्रदेश में धान खरीदी को लेकर किसानों की परेशानियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। 31 जनवरी तक धान बेचने की अंतिम तिथि तय होने के बाव...
रायपुर।
प्रदेश में धान खरीदी को लेकर किसानों की परेशानियां लगातार बढ़ती जा रही
हैं। 31 जनवरी तक धान बेचने की अंतिम तिथि तय होने के बावजूद कुछ जिलों में
बीते दिनों से ऑनलाइन टोकन बंद कर दिए गए थे। अब समितियों में ऑफलाइन टोकन
भी बंद कर दिए गए हैं। इससे रायपुर समेत कई जिलों की समितियों में किसानों
की नाराजगी सामने आने लगी है।
समिति प्रभारियों ने किसानों को
स्पष्ट रूप से बताया है कि नोडल अधिकारी द्वारा भौतिक सत्यापन के बाद ही
टोकन जारी किए जाएंगे। इस स्थिति के चलते धान खरीदी की प्रक्रिया लगभग ठप
हो गई है। समितियों की ओर से खरीदी लिमिट बढ़ाने के लिए मार्कफेड और
प्रशासन को पत्र भेजे गए हैं, लेकिन अब तक इस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया
है।
रायपुर जिले की कई समितियों में 31 जनवरी तक के लिए ऑनलाइन टोकन
पहले ही बुक हो चुके हैं। कुकेरा, कुथरेल, सिलयारी, पथरी, सारागांव,
निलजा, खौना, मढ़ी, बरतोरी, रायखेड़ा, किरना, निनवा, नगरगांव, देवरी,
धरसीवा, पंडरभट्ठा, सांकरा और मोहदी समितियों में लिमिट बढ़ाने की लगातार
मांग की जा रही है। सिलयारी समिति में ही करीब 20 प्रतिशत किसान अब तक धान
नहीं बेच पाए हैं।
शुक्रवार को किसानों ने जिला कलेक्टर के नाम
सिलयारी के शाखा प्रबंधक और सारागांव के नायब तहसीलदार अरुण जंघेल को
ज्ञापन सौंपकर टोकन जारी करने की मांग की। किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि
समस्या का समाधान नहीं हुआ तो सोमवार को समिति में प्रदर्शन कर तालाबंदी
की जाएगी। ज्ञापन सौंपने वालों में कांग्रेस के पूर्व रायपुर ग्रामीण
अध्यक्ष उधोराम वर्मा सहित कई किसान शामिल थे।
पूर्व मुख्यमंत्री
भूपेश बघेल ने धान खरीदी के मुद्दे पर राज्य सरकार पर निशाना साधा है।
उन्होंने इंटरनेट मीडिया पर रायगढ़ के राजस्व पटवारी संघ द्वारा जिला
कलेक्टर को सौंपे गए ज्ञापन को साझा करते हुए लिखा कि प्रदेश के किसान जान
चुके हैं कि डबल इंजन वाली भाजपा सरकार किसानों का धान नहीं खरीदना चाहती
है।
उन्होंने कहा कि राजस्व पटवारी संघ रायगढ़ द्वारा सौंपे गए
ज्ञापन के बिंदु धान खरीदी को लेकर सरकार की मंशा को स्पष्ट करते हैं।
पटवारियों ने आरोप लगाया है कि राज्य सरकार के उच्चाधिकारियों की ओर से
किसानों पर रकबा समर्पण के लिए अनावश्यक दबाव बनाया जा रहा है। यह आरोप
सरकार के किसान विरोधी चेहरे को उजागर करता है। उन्होंने शासन-प्रशासन से
ऐसे आदेशों को तुरंत रोकने और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की
है।



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