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अफीम की खेती बनी राजनीतिक मुद्दा, मंत्रियों के जिलों पर उठे सवाल

   रायपुर। प्रशासनिक विफलता और प्रदेश के मंत्रियों के गृह जिले में अफीम की खेती के मामले सामने आने से सियासी विवाद बढ़ गया है। दुर्ग, बलरा...

  

रायपुर। प्रशासनिक विफलता और प्रदेश के मंत्रियों के गृह जिले में अफीम की खेती के मामले सामने आने से सियासी विवाद बढ़ गया है। दुर्ग, बलरामपुर में दो जगह और रायगढ़ में करोड़ों रुपये की अफीम की फसल पकड़े जाने के बाद सियासत गर्म है।

इस मामले ने न केवल नौकरशाही की सतर्कता पर सवालिया निशान खड़े किए हैं, बल्कि विपक्ष को बैठे बैठाए मुद्दा भी दे दिया है। कांग्रेस ने अब तक पकड़ी गई अफीम की खेती से भाजपा नेताओं और मंत्रियों से नाता जोड़ते हुए प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

कांग्रेस का दावा है इस मामले में भाजपा के बड़े नेता भी शामिल हैं। वहीं, भाजपा ये कहते हुए पलटवार करती दिख रही है कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में भी प्रदेश नशोखोरी में लिप्त रहा है। भाजपा इस कोशिश में है कि ये साबित किया जा सके कि ये खेती और नशाखोरी कांग्रेस की सरकार के समय से ही हो रही है।

राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि इस राजनीतिक दंगल के बीच सबसे बड़ा सवाल छत्तीसगढ़ के युवाओं के भविष्य का है। अगर सीमावर्ती राज्यों के गिरोह यहां के खेतों में जड़े जमा लेते हैं, तो राज्य को उड़ता छत्तीसगढ़ बनने से रोकना मुश्किल होगा।

मुख्यमंत्री के निर्देश पर अब हवाई सर्वेक्षण और ड्रोन से निगरानी की जा रही है, लेकिन असली चुनौती जमीनी स्तर पर सूचना तंत्र को मजबूत करने और संलिप्त अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई करने की है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने इस पूरे घटनाक्रम को "सरकारी संरक्षण" का परिणाम बताया है। कांग्रेस ने सरकार को घेरते हुए पूछा है कि क्या शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, कृषि मंत्री रामविचार नेताम और वित्त मंत्री ओपी चौधरी के गृह जिलों में ही अफीम मिलना महज एक इत्तेफाक है या भाजपा का कोई नया कृषि प्रयोग?

बैज ने आरोप लगाया कि दुर्ग के मुख्य आरोपित के भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ मधुर संबंध हैं। कांग्रेस का सीधा सवाल है कि गिरदावरी रिपोर्ट में अफीम को "सब्जी या अन्य फसल" कैसे दिखाया गया? क्या यह भ्रष्टाचार और प्रशासनिक मिलीभगत का जीता-जागता उदाहरण नहीं है?

विपक्ष के आरोपों पर पलटवार करते हुए भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता केएस चौहान ने इसे सुशासन बनाम कुशासन की लड़ाई करार दिया है। भाजपा का दावा है कि कांग्रेस शासनकाल में छत्तीसगढ़ नशे का नेशनल हाई-वे बन गया था और तब शराब से लेकर अन्य नशीले पदार्थों के तस्करों को खुला संरक्षण प्राप्त था।

इसके पहले विधानसभा में भाजपा विधायक अजय चंद्राकर ने तो यहां तक कह दिया कि अफीम की खेती की जड़ें पिछली सरकार के समय से ही जम चुकी थीं।

दुर्ग के समोदा गांव में मक्के की आड़ में लहलहाती 5.62 एकड़ की अफीम की फसल ने शासन-प्रशासन की गिरदावरी रिपोर्ट की पोल खोल दी है। सवाल यह उठ रहा है कि जब पटवारी और राजस्व अमला खेतों का मुआयना करते हैं, तो उन्हें इतनी बड़ी फसल क्यों दिखाई नहीं दी? यही हाल बलरामपुर और रायगढ़ का भी है।

प्रशासन की इस अंधेरी कोठरी का फायदा उठाकर अंतरराज्यीय गिरोहों ने छत्तीसगढ़ की धरती को नशे के कारोबार का नया केंद्र बना दिया है। हालांकि, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सख्त रुख अपनाते हुए 15 दिनों के भीतर कलेक्टरों से अफीम मुक्त होने का प्रमाण पत्र मांगा है।

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