बिलासपुर। सरगुजा क्षेत्र में पुलिस आरक्षक द्वारा की गई 27 लाख रुपये की गड़बड़ी के मामले की जांच फिर से होगी। हाई कोर्ट ने राज्य शासन की...
बिलासपुर।
सरगुजा क्षेत्र में पुलिस आरक्षक द्वारा की गई 27 लाख रुपये की गड़बड़ी के
मामले की जांच फिर से होगी। हाई कोर्ट ने राज्य शासन की अपील स्वीकार करते
हुए सभी गवाहों को समय पर उपस्थित होने कहा है।
2008 में आरक्षक के
पद पर भर्ती हुए सत्य प्रकाश भगत ने कार्यालय पुलिस अधीक्षक, सरगुजा पदस्थ
रहते हुए अधिकारियों-कर्मचारियों के वेतन देयक तैयार करते हुए कुल
26,40,870 रुपये की शासकीय राशि का गबन किया था।
मामले में पुलिस ने
एफआइआर की थी, लेकिन 28 बार समन जारी करने और अवसर दिए जाने के पश्चात एक
भी साक्षी कोर्ट में उपस्थित नहीं हुआ। इसी आधार पर जिला कोर्ट ने मामले को
अपास्त कर दिया था। सत्य प्रकाश भगत की पोस्टिंग 2010 में आरक्षक के पद
कार्यालय पुलिस अधीक्षक, सरगुजा के वेतन शाखा में हुई।
भगत
कम्प्यूटर के माध्यम से समस्त अधिकारियों-कर्मचारियों के वेतन देयक तैयार
कर कोषालय से ई-पेमेंट के माध्यम से उनके बैंक खातों में राशि अंतरित करता
था।
अभियुक्त सत्य प्रकाश भगत द्वारा माह जून 2011 में अपने नक्सली
भत्ते की राशि 1,610 रुपये के स्थान पर 16,100 रुपये व जून 2012 में भी
1,610 रुपये के स्थान पर 16,100 रुपये अपने बैंक खाते में अंतरित कराई गई।
फरवरी 2013 में स्पेशल राशनमनी 650 रुपये के स्थान पर छह लाख 50 हजार
रुपये, जनवरी 2013 में 650 रुपये के स्थान पर छह लाख 50 हजार तथा माह जनवरी
2014 में स्पेशल राशनमनी 650 रुपये के स्थान पर छह लाख 50 हजार रुपये
अंतरित करवाया गया।
दिसंबर 2013 में आरक्षक सुनील कुमार के बैंक
खाते, जो मूलतः अभियुक्त सत्य प्रकाश भगत के पिता दयाराम भगत का खाता
क्रमांक था, उसमें छह लाख 64,192 रुपये डाले गए। अभियुक्त द्वारा कुल
26,40,870 रुपये की शासकीय राशि का गबन किया गया। बाद में मामला पकड़ में
आया और थाना अंबिकापुर में अपराध क्रमांक 91/2014 पंजीबद्ध किया गया।
विचारण
न्यायालय न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, अंबिकापुर में अभियोगपत्र
प्रस्तुत होने के पश्चात प्रकरण लंबे समय तक लंबित रहा। नौ मार्च 2016 को
अभियुक्त के विरुद्ध धारा 420 एवं 409 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत आरोप
तय किए गए। इसके बाद गवाहों और साक्षियों के नाम समन जारी होता रहा लेकिन
किसी का परीक्षण नहीं हो सका। अधिकांश स्थितियों में तो समंश की तामीली तक
नहीं हो सकी।
इसी कारण विचारण न्यायालय ने साक्ष्य का अवसर समाप्त
करते हुए 17 जनवरी 2020 को आरोपित को दोषमुक्त कर दिया। राज्य सरकार ने
अपीलीय न्यायालय-पंचम अपर सत्र न्यायाधीश, अंबिकापुर में इसकी अपील की।
इसमें भी कोई नहीं पहुंचा और अपील खारिज कर दी गई।
सुनवाई के बाद
हाईकोर्ट ने कहा कि विचारण न्यायालय के समक्ष साक्षियों को उपस्थित कराने
की जिम्मेदारी अभियोजन अर्थात पुलिस पर होती है तथा समन, जमानतीय वारंट एवं
गिरफ्तारी वारंट की तामील भी पुलिस द्वारा ही सुनिश्चित की जाती है। ऐसी
स्थिति में 28 अवसर दिए जाने के पश्चात एक भी साक्षी का न्यायालय में
परीक्षण ना करा पाना पुलिस की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाला है।
उपर्युक्त परिस्थितियों में अपीलीय न्यायालय द्वारा प्रकरण को पुनः विचारण
न्यायालय को प्रेषित कर अभियोजन को साक्ष्य का अवसर प्रदान करने के निर्देश
देना विधिसम्मत है।



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