नई दिल्ली । आज के दौर में जब हम एलन मस्क या जेफ बेजोस की दौलत की चर्चा करते हैं, तो 18वीं सदी के भारत के जगत सेठ के सामने ये आंकड़े भी ब...
नई
दिल्ली । आज के दौर में जब हम एलन मस्क या जेफ बेजोस की दौलत की चर्चा
करते हैं, तो 18वीं सदी के भारत के जगत सेठ के सामने ये आंकड़े भी बौने नजर
आते हैं। आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुमान के अनुसार, इस परिवार की कुल
संपत्ति आज के मूल्य में करीब $100 बिलियन (8.3 लाख करोड़ रुपये) से अधिक
थी। यह वह दौर था जब दुनिया की कुल जीडीपी (GDP) का करीब 25% हिस्सा अकेले
भारत से आता था और उसका एक बड़ा हिस्सा इस अकेले परिवार के नियंत्रण में
था।
1. वैश्विक बैंकिंग का केंद्र: मुर्शिदाबाद से लंदन तक धाक
जगत सेठ परिवार की शक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी तुलना उस दौर के 'बैंक ऑफ इंग्लैंड' से की जाती थी।
राजस्व का प्रबंधन: यह परिवार बंगाल के नवाबों के लिए राजस्व वसूलने से लेकर सरकारी खजाने के रख-रखाव तक का काम करता था।
करेंसी कंट्रोल: उन्हें सिक्के ढालने और विदेशी मुद्रा विनिमय (Foreign Exchange) का विशेष अधिकार प्राप्त था।
ईस्ट इंडिया कंपनी का साहूकार: ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी अपनी व्यापारिक गतिविधियों और युद्धों के लिए इन्हीं से कर्ज लेती थी।
'फतेह चंद' और 'जगत सेठ' की उपाधि
इस
साम्राज्य की नींव पटना के माणिक चंद ने रखी थी, लेकिन इसे वैश्विक पहचान
उनके दत्तक पुत्र फतेह चंद ने दिलाई। 1712 में दिल्ली के मुगल बादशाह
फर्रुखसियर ने उन्हें 'नागर सेठ' कहा, लेकिन बाद में उनकी अकूत संपत्ति और
प्रभाव को देखते हुए उन्हें 'जगत सेठ' यानी 'दुनिया का सेठ' की उपाधि दी
गई।
राजनीति का 'किंगमेकर' और ऐतिहासिक मोड़
जगत सेठ केवल
बैंकर नहीं, बल्कि राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी थे। इतिहासकार रॉबर्ट ओर्मे
के अनुसार, मुर्शिदाबाद की सत्ता किसके हाथ में होगी, यह जगत सेठ तय करते
थे।
प्लासी का युद्ध (1757): नवाब सिराजुद्दौला के साथ मनमुटाव के
बाद, जगत सेठों ने रॉबर्ट क्लाइव और अंग्रेजों का साथ देने का फैसला किया।
यह एक ऐसा ऐतिहासिक मोड़ था जिसने न केवल बंगाल, बल्कि पूरी दुनिया का
नक्शा बदल दिया और ब्रिटिश साम्राज्य की नींव मजबूत की।
साम्राज्य का सूर्यास्त: जब कर्जदार ही बन गए मालिक
प्लासी
के युद्ध के बाद इस परिवार का पतन भी उतनी ही तेजी से हुआ। ब्रिटिश कंपनी
ने व्यापार पर एकाधिकार कर लिया और जगत सेठों का भारी कर्ज कभी नहीं
लौटाया।
कंगालियत का दौर: 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद
यह परिवार पूरी तरह बिखर गया। ब्रिटिश सत्ता के विस्तार ने उनके बैंकिंग
मॉडल को ध्वस्त कर दिया।
कहां हैं वंशज?: यह इतिहास की सबसे बड़ी
विडंबना है कि जो परिवार दुनिया को उधार देता था, उसके वंशज 20वीं सदी की
शुरुआत तक गुमनामी के अंधेरे में खो गए। आज उनके वास्तविक उत्तराधिकारियों
के बारे में कोई पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है।



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